4

बरसत कम्बल भीजत पानी#1

कबीर के भाव... 03-08-2025
6

बरसत कम्बल भीजत पानी#2

माला फेरत जुग... 03-08-2025
7

बरसत कम्बल भीजत पानी#3

साईं इतना दीजिए... 16-08-2025
4

बरसत कम्बल भीजत पानी#4

माँगन मरण समान... 20-02-2026

बनारस कितना पुराना है पिछले अंक में मैंने काशी की पुरातनता को गंगा के अवतरण से जोड़ते हुए समझने का प्रयास किया था। लेकिन मेरी खोज जारी थी कि कुछ और अधिक और पुष्ट प्रमाण मिले। इसी खोज के क्रम में मुझे निलेश ओक का एक इंटरव्यू यू ट्यूब पर सुनने का मौक़ा मिला। जैसा कि मैंने बताया था कि हमारे ग्रंथों में से महाभारत एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें वाराणसी का जिक्र बहुत संजीदगी से किया गया है। इस हालत में ये जरुरी हो जाता है कि हमें सही-सही ज्ञात हो कि महाभारत का युद्ध कब हुआ था। निलेश ओक जी विदेश में इंजीनियर की नौकरी करते-करते ऐसा लगा कि उन्हें भारत के इतिहास के उन पहलुओं को उजागर किया जाय जो अभी तक अंधेरे में हैं। उन्होंने एक पुस्तक भी लिखी है, ‘When did the Mahabharat War Happen - Mystery of Arundhati’। निलेश कहते हैं कि पश्चिमी इतिहासकार कहते हैं कि भारत में इतिहास उस प्रकार नहीं लिखा गया जैसे पश्चिम में लिखा जाता है और और उसके कारण समय काल का निर्धारण करना संभव नहीं है, लेकिन ये ये ग़लत धारणा फैलाई गई है। ‘बनारस का इतिहास’ के लेखक डॉक्टर मोतीचंद्र जी लिखते हैं, भारतीयों में ऐतिहासिक भावना की कमी होने से बनारस सम्बन्धी सामग्री परिसीमित है. अभिलेखों इत्यादि से यहाँ के इतिहास पर धुंधला प्रकाश पड़ जाता है, पर उनका विषय ब्राह्मणों को दान दक्षिणा देना ही मुख्य है.‘ दरअसल हमारे यहाँ history भले न लिखी गई हो पर इति हा स(यह सचमुच हुआ था) लिखा गया है। हमारे ग्रंथों में खगोलशास्त्रीय समय का वर्णन किया गया है और ये ऐसे प्रमाण हैं जिन्हें इस सौर मंडल के रहते तक झुठलाया नहीं जा सकता क्योंकि ग्रहों और नक्षत्रों की गति और उनके स्थान इस सौर मंडल के निर्माण के समय से एक निश्चित सामंजस्य में चले आ रहे हैं। उनका कहना है कि पश्चिमी विद्वानों का ये कहना कि कोई भी गणना 2200 ई०पू० के पीछे जा ही नहीं सकती बिलकुल गलत है। हमारे देश में ही राखीगढ़ी की खुदाई में 7000 ई०पू० तक के प्रमाण मिले हैं। निलेश जी कहते हैं कि पश्चिम में तो डारविन के पहले ग्रंथ के नाम पर केवल बाइबिल ही था जबकि उसके हज़ारों साल पहले से भारत में प्रचुर मात्रा में ग्रंथ मौजूद रहे हैं। उन्होंने महाभारत के श्लोकों में दी गई खगोलशास्त्रीय प्रमाणों को आधार बना कर ये सिद्ध किया है कि महाभारत का युद्ध 5525 ई०पू० हुआ था। उन्होंने बताया कि ये महाभारत में ही उल्लिखित है कि महाभारत का युद्ध समाप्त होने के 36 वर्ष बाद कृष्ण जी की द्वारिका समुद्र में समा गई थी। उन्होंने ओसेनोग्राफी के प्रमाणों से सिद्ध किया कि द्वारिका के जलमग्न होने का वर्ष 5561 ई०पू० है जिसके आधार पर भी ये निश्चित होता है कि महाभारत का युद्ध 5525 ई०पू० में हुआ था। निलेश जी ने विश्व के सभी वैज्ञानिकों, इतिहासकारों, खगोलशास्त्रियों से कहा है कि अगर उनकी गणना में कोई त्रुटि हो तो वो सामने आकर बतायें। अब ही निश्चित हो जाने के बाद की महाभारत का युद्ध आज से सात हजार पाँच सौ वर्ष पहले हुआ था ये साबित होता है कि सात हजार पाँच सौ वर्ष पूर्व काशी एक समुन्नत और समृद्ध महाजनपद था। इससे भी गंगा के अवतरण वाले समय के पूर्व काशी के होने की पुष्टि होती है। मैं ये लेख देश के सभी इतिहासकारों के समक्ष रख रहा हूँ कि इस संबंध में अगर उनके कोई विचार हों तो वो कृपया शेयर करने का कष्ट करें। हाँ एक अनुरोध ज़रूर है कि लेख के बड़ा हो जाने के भय से मैंने उन सारे श्लोकों को यहाँ नहीं दिया है जिनके आधार पर निलेश ओक ने ये समय काल निर्धारित किया है इसलिए पहले इस पुस्तक को अवश्य पढ़ लें। ये सारी गणना Triangulation date method using position of slow moving planets के द्वारा की गई है।

काशी और शिव!

एक दूसरे के पूरक या एक दूसरे में लीन।

शिव ही काशी हैं और काशी साक्षात शिव हैं। शिव आदि हैं, शिव अनंत हैं। पर शिवलिंग ? शिवलिंग की पूजा का क्या अर्थ है। शिव की पूजा के लिए शिवलिंग का प्रतीक क्यों प्रयोग किया जाता है। ओशो ने अपनी एक शृंखला ‘हँसा तो मोती चुगे’ में इस पर प्रकाश डाला है । ध्यानी नहीं शिव सारसा, ग्यानी सा गोरख। ररै रमै सूं निसतिरयां, कोड़ अठासी रिख।। ध्यानी नहीं शिव सारसा,... शिव जैसा ध्यानी नहीं है। ध्यानी हो तो शिव जैसा हो। क्या अर्थ है? ध्यान का अर्थ होता है: न विचार, न वासना, न स्मृति, न कल्पना। ध्यान का अर्थ होता है: भीतर सिर्फ होना मात्र। इसीलिए शिव को मृत्यु का, विध्वंस का, विनाश का देवता कहा है। क्योंकि ध्यान विध्वंस है--विध्वंस है मन का। मन ही संसार है। मन ही सृजन है। मन ही सृष्टि है। मन गया कि प्रलय हो गई। ऐसा मत सोचो कि किसी दिन प्रलय होती है। ऐसा मत सोचो कि एक दिन आएगा जब प्रलय हो जाएगी और सब विध्वंस हो जाएगा। नहीं, जो भी ध्यान में उतरता है, उसकी प्रलय हो जाती है। जो भी ध्यान में उतरता है, उसके भीतर शिव का पदार्पण हो जाता है। ध्यान है मृत्यु--मन की मृत्यु, ‘मैं’ की मृत्यु, विचार का अंत। शुद्ध चैतन्य रह जाए--दर्पण जैसा खाली! कोई प्रतिबिंब न बने।