हम रिटायर लोगों की एक ज़मात है. सब एक ही संस्था में काम करते थे. उस समय सब जवान थे, शक्तिवान थे. सबकी अपनी-अपनी महत्वकांक्षाएं थीं. सब एक रेस में दौड़ रहे थे दूसरे से आगे निकालने की होड़ में. सबके परिवार बने, गृहस्थी बनी. समय भागता रहा, बच्चे बड़े होते गये और हम बूढ़े. फिर एक-एक करके सब रिटायर होने लगे. रिटायरमेंट के दिन उन्हें फूल मलाओं से लाद दिया गया, उनकी शान में खूब कसीदे पढ़े गये. सबने कहा सर आप संस्था से जा रहे हैं हमारे दिलों से नहीं. आप एक आवाज लगा देना हम हाजिर हो जायेंगे. पर ये सब कहने की बातें होती हैं. हमारे समाज में मृत और रिटायर व्यक्ति के बारे में बुरा बोलना वर्जित है. तो ये समझ में आया कि अब रिटायर लोग भी अपनी अलग ज़मात बना लें और सुविधानुसार माह दो माह में एक बार कहीं मिल के अपने दुःख सुःख साझा कर लें. ज़मात बन गयी और मिलना जुलना शुरू हो गया. अब आपस में कोई भेद नहीं था कि कौन क्लर्क है और कौन अधिकारी. सब एक से, बूढ़े, थके और रिटायर और ये रिटायर होना ही उनकी सबसे बड़ी पहचान है. इस ज़मात के संस्थापक मित्रों में से एक अपने कूल्हे के ऑपरेशन के कारण स्वयं कहीं आने जाने में असमर्थ थे तो कोई न कोई मित्र उन्हें अपने वाहन से ले जाने की जिम्मेदारी वहन करता है. बीते दिनों किसी बैठक में जो बिलकुल अप्रत्याशित रूप से हो गयी थी उसमे उन्हें न तो बुलाया गया और न ही कोई लेने पहुंचा. वो बैठक थी ही नहीं अचानक दो चार मित्र एक मित्र के यहाँ पहुँच गये और बैठकी हो गयी. मुझे स्वयं भी उस बैठक के बारे में न तो ज्ञात हुआ था और न ही मैं गया था. और वो संस्थापक मित्र उस घटना से बहुत आहत हुए और अब वो न तो किसी का फोन उठा रहे हैं और न ही व्हाट्सएप्प या किसी सोशल मीडिया पर अपनी उपस्थिति दे रहे हैं. मैं सोचने लगा कि उम्र के इस पड़ाव पर जबकि हम सबके एक पाँव क़ब्र में हैं इतना क्रोध क्यों? सोचते-सोचते मेरा सर भारी हो गया पर मुझे कोई उत्तर नहीं सूझ रहा था. मैने ओशो की मदद लेने का फैसला किया. ओशो कबीर को याद करते हुए कहते हैं कि कबीर ने कहा कि -- काम क्रोध अरु लोभ विवर्जित, हरिपद चीन्हैं सोई॥ राजस ताँमस सातिग तीन्यूँ, ये सब मेरी माया। चौथे पद कौं जे जन चीन्हैं, तिनहिं परम पद पाया॥ क्रोध काम और लोभ का bi-product है. काम यानी कामना. कामना माने जो है, जो प्राप्त है उससे संतुष्टि नहीं है. जैसे मित्र को जितना प्रेम मिला था उन्हें उसका अहोभाव नहीं है बल्कि और-और पाने की अभिलाषा है. काम माने अतीत की ओर लगी हैं ऑंखें और अतीत जा चुका . लोभ है भविष्य की ओर देखना कि और पाना है. और जब काम और लोभ पूरे नहीं होते तो क्रोध जन्मता है. क्रोध का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है. काम और लोभ विदा हो जाये तो क्रोध स्वतः विदा हो जायेगा. असतुति निंद्या आसा छाँड़ै, तजै माँन अभिमानाँ। लोहा कंचन समि करि देखै, ते मूरति भगवानाँ॥ अब मुझे लगता है कि कबीर जो मेरे नाम से जुड़ गये हैं तो कबीर पर अपनी समझ से एक श्रृंखला शुरू करूँ. चलते हैं कबीर के साथ उनकी यात्रा में, आनंद आएगा. हम लोग इस श्रृंखला को नाम देंगे - “बरसत कम्बल भीजत पानी”.