साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय । मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥ कबीर किसी इलीट क्लास से नहीं आते। फ़क़ीरों जैसा जीवन है। रोज़ कुआँ खोदना रोज़ पानी पीना। संग्रह की कोई कामना नहीं है। बैंक बैलेंस नहीं देखना। शिष्यों की कोई कमी नहीं और बहुत से शिष्य बहुत अमीर हैं। उनको अच्छा नहीं लगता कि उनका गुरु कपड़ा बुने और उसे बाज़ार में बेचे। उनके अहंकार को चोट लगती कि उनका गुरु और इतना निरीह। वो कहते क्या आप भी कपड़े बुनते हैं, ये आपको शोभा नहीं देता। हम किस दिन के लिए हैं। तब कबीर गरज उठते हैं - ‘मंगन से क्या माँगिए’। एक बार फ़रीद को उसकी पत्नी ने कहा कि अकबर के दरबार में चले जाओ। फ़क़ीरों की वो बहुत इज़्ज़त करता है, न कुछ तो बच्चों के लिए एक स्कूल माँग लेना। फरीद बहुत मूल्य का फ़क़ीर था। पहले तो साफ़ मना कर दिया कि मैं नहीं जा रहा। पर पत्नी के आगे किसकी चली है। भगवान राम क्या नहीं जानते थे कि सोने का मृग नहीं होता पर सीता जी अड़ गईं तो जाना पड़ा। अगर उस दिन राम जी ने सीता माँ को समझा लिया होता कि देवी सोने का मृग हो ही नहीं सकता तो शायद रामायण की कथा वो नहीं होती जो आज है। पत्नी और वो तुम्हें न समझा ले तो उसके पत्नीत्व पर संदेह उठ जाएगा, तो फ़रीद को जाना पड़ा। फ़रीद पहुँचा महल के द्वार पर। अकबर ने कह रखा था कि कोई फ़क़ीर आए तो उसे मुझसे मिलवाये बिना वापस न करना। दरबान उसे अकबर के कक्ष में बिठा आया। अकबर नमाज़ पढ़ रहा था। नमाज़ ख़त्म हुई तो उसने दोनों हाथ उठा कर कहा ही अल्लाह मुझे इतना दे कि मैं अपने लोगों की सेवा कर सकूँ। फरीद ने सुना तो तत्काल उठ गया और बाहर की ओर चल दिया। अकबर की आँख खुली तो देखा फ़क़ीर बिना कुछ माँगे वापस जा रहा है। उसने आवाज़ दी कि आयें और माँगें क्या माँगते हैं। फ़रीद ने कहा कि अब बात ही ख़त्म हो गई। मैंने देखा कि तुम भी हाथ फैला के माँग रहे थे, अब मंगन से क्या माँगना। तुम जिससे माँग रहे थे मैं भी उसी से माँग लूँगा, तुमसे क्यों माँगू। और माँग भी क्या? जिसमे परिवार चल जाय। साईं इतना भर देना कि मेरा परिवार चल जाय। कबीर जब प्रवचन करते तो जब प्रवचन समाप्त होता तो जितने लोग बैठे होते उनसे कहते कि अब इतनी देर से बैठे हैं तो कुछ भोजन ग्रहण करके जायें। प्रवचनों में भंडारे की प्रथा लगता है कि कबीर ने ही डाली होगी कि इतनी देर उनकी बात सुनी तो घर पर कौन इंतजार करता बैठा होगा। तो खा के जाना। आजकल के बाबा लोगों के प्रवचनों में अतुल धनराशि आती है। कबीर जैसे फ़क़ीर नहीं रह गए आजकल के बाबा लोग। करोड़ों की लक्ज़री गाड़ियों में चलते हैं, उनके वस्त्र, उनकी घड़ियाँ तक दुनिया के महंगे ब्रांडों की होती है। उनके काफ़िले में विदेशी गाड़ियाँ होती हैं। कुछ बाबाओं के अपने प्राइवेट जहाज़ हैं। उधर कबीर की पत्नी अड़चन में पड़ जातीं कि घर में कुछ है नहीं और इनको भंडारा करना है। भीतर भी नहीं आते कि धीरे से बता देती कि घर में कुछ है नहीं, बाहर ही डेरा जमा के बैठे रहेंगे। तो ये जो साधूगण आ गए हैं वो भूखे न चले जायें इतना भर ख्याल कर लेना। तो माँग उठी कि साधु न भूखा जाय। मेरे द्वार पर कोई आया है वो भूखा न रहे बस इतना दे देना। योग में अपरिग्रह का बड़ा मूल्य है। संचय की कामना न रह जाय उसे अपरिग्रह कहते हैं। कबीर अपने सीधे-साधे वचनों से योग की एक विधा सिखा रहे हैं, अपरिग्रह। उन्हें भी संचय नहीं करना है बस उनका परिवार और उनके द्वार पर आया अतिथि भूखा न सोने पाये, उतना भर। कबीर का कोई आग्रह नहीं है कि उन्हें योग का प्रणेता माना जाए तो वो एक गृहस्थ की भाषा का प्रयोग करते हैं। कोई अलंकार नहीं, कोई भारी भरकम शब्दों का जाल नहीं। सहज जैसा एक साधारण व्यक्ति कह सकता है उसी भाषा में। और ऐसी भाषा ही सीधे हृदय पर चोट करती है, तीर की तरह। पतंजलि ने इसी को ऐसे कहा - अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथासंबोध:।”अपरिग्रह में स्थिरता प्राप्त करने से, अतीत और भविष्य के जन्मों का ज्ञान होता है। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा कि- योगी युंजिता सतत्तात्मानम रहसि स्थितः एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहा ।। पर कबीर अद्भुत हैं, निराले हैं इतनी बड़ी बात को इतनी सहजता से केवल कबीर कह सकते हैं। मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भूखा जाये ।