कबीर एक आग हैं। उनके साथ चलना बड़े साहस का काम है। वो तो ललकारते हैं कि कबिरा खड़ा बाज़ार में लिए लुकाठी हाथ, जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ। है हिम्मत तो जला डालो अपने अहंकार के तभी चल सकोगे मेरे साथ। कबीर के साथ चलना अंगारे पर चलना है। जैसे आग में सोना डालो तो उसका सारा कूड़ा करकट जल कर खाक हो जाता है और शेष जो बचता है वो होता खरा सोना, एकदम चौबीस कैरेट का। कबीर के साथ चले तो तुम भी खरा सोना हो जाओगे पर साहस करना पड़े तो ही चल सकोगे। ओशो अक्सर एक प्रसंग सुनाते हैं कि सिकंदर जब विश्व विजय के लिए निकलने वाला था तो किसी ने कहा कि डायोजेनीज़ से मिल कर जाना उचित होगा। डायोजेनीज़ एक माना जाना फ़क़ीर था उस समय का। तो सिकंदर गया मिलने उससे। लेटा था वो समंदर के किनारे रेत पर एकदम नग्न, धूप सेंक रहा था। सिकंदर पहुँचा और घोड़े पर बैठे-बैठे फ़क़ीर को प्रणाम किया। डायोजेनीज़ ने उसकी ओर देखा भी नहीं। सिकंदर बोला शायद आपने पहचाना नहीं, मैं सिकंदर महान विश्व विजय पर निकला हूँ। आपको कुछ चाहिए तो बोलिए लेता आऊँगा। डायोजेनीज़ ने कहा कि अगर तुम मुझे कुछ देना ही चाहते हो तो थोड़ा सरक जाओ तुमने मेरी धूप रोक रखी है। सिकंदर तो अवाक् रह गया। इसके सामने इतना बड़ा सम्राट खड़ा है और ये माँग क्या रहा है? पर सिकंदर नहीं समझा राज़। जो ख़ुद कुछ पाने की लालसा में है उससे क्या माँगना? सिकंदर ने कहा - क्या कहते हैं आप मैं विश्व विजय के लिए निकला हूँ? फ़क़ीर ने पूछा कि विश्व पूरा जीत लोगे तो क्या करोगे? सिकंदर ने कहा कि तब विश्राम करूँगा। फ़क़ीर ठठा कर हँसा। उसने कहा कि आराम करने के लिए इतनी मशक्कत? अरे आओ मेरे बगल में बहुत सी जगह है लेट जाओ और विश्राम करो किसने रोका है। आराम करने के लिए पूरे विश्व को जीतने की क्या आवश्यकता है। पर हमारा मन हमें दौड़ाता रहता है। ये भी पा लूँ तब विश्राम, वो भी पा लूँ तब विश्राम। हम भूल ही गए हैं कि हम सम्राट पैदा ही हुए हैं। मगर हमे अपना पता ही नहीं है। और किसी से क्या माँगना? मांगे कि मरे । माँग उठी नहीं कि तुम सम्राट से भिखारी हुए नहीं। जो भी पाने योग्य है वो सब तुम्हें मिला ही हुआ है। ख़ुद को पहचानो। वो परम आत्मा तुम्हारे भीतर है, और जो तुम्हारे पास मौजूद ही है वो दूसरा तुम्हें कैसे दे सकता है। उसके लिए तो तुम्हें जागना पड़ेगा। जागोगे तो जानोगे कि जिसको तुम माँगते फिर रहे हो वो तो तुम्हारी मालकियत है। जिसके तुम ख़ुद ही मालिक हो उसके लिए किसी से भीख क्यों माँगोगे। कस्तूरी मृग कुंडल बसे । कबीर जगा रहे हैं। उनकी चोट ऐसी ही होती है । वो याद दिला रहे है कि तुम भिखारी नहीं हो। पाषाण-पृष्ठ पर नवाघात, पैदा करता नव चिंगारी , जिसकी आभा में दृश्यमान, हो सकती हैं निधियाँ सारी । तो तुम्हारे पत्थर हो चुके मन पर आघात कर रहे हैं कबीर ये कह कर कि माँगना मर जाने के समान है, मांगने से अच्छा तो मर जाना है। ये आघात सह गए तो इसकी आभा में तुम्हारे भीतर जो रत्न छुपा है वो दिखने लगेगा। उठो जागो पहचानो ख़ुद को परमात्मा का साम्राज्य तुम्हारी अगवानी को पलक पाँवड़े बिछा कर खड़ा है।