माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर । कर का मन का डार दें, मन का मनका फेर ॥ कबीर कोई कवि नहीं हैं। किसी विद्यालय में धर्म और आध्यात्म के प्रवक्ता नहीं हैं। सीधे-साधे जुलाहे हैं, बुनते हैं कपड़ा और अपनी धुन में गुनगुनाते जाते हैं। पढ़े लिखे नहीं हैं तो जिंदगी में जो देखा है, किया है उसी भाषा में बोलते हैं। तभी तो कह दिए कि ‘ ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया’। कोई भाषा का विद्वान होता तो इसे इतना घुमा फिरा कर शब्दों के आवरण में प्रस्तुत करता पर कबीर तो अनपढ़ हैं, कोई स्कूल नहीं गए, कोई डिग्री की तख़्ती नहीं है। बस जीवन से उपजे भाव हैं। तो कबीर के शब्दों पर नहीं जाना है अन्यथा अड़चन होगी। कबीर भावों की मधुशाला हैं, उनको तो पीना पड़ेगा तभी समझ में आ सकते हैं। कबीर को व्याकरण और शैली से समझने की कोशिश की तो चूकना निश्चित है। उनको समझना है तो भावों की नदी में उतरना पड़ेगा। ऐसा नहीं है कि कबीर पर कुछ लिखा नहीं गया, बहुत साहित्य लिखा गया है विद्वानों द्वारा, बड़े विमर्श किए गए हैं। अभी मैं कहीं पढ़ता था किसी विद्वान का कोई लेख, वो कहते हैं कि कबीर साम्यवादी लेखक हैं। ये सब कबीर को जानने की कोशिश नहीं है अपितु कबीर के नाम पर ख़ुद को विद्वान साबित करने का अहंकार है। कहाँ साम्यवाद ? कहाँ दलित विमर्श ? इतने भारी भरकम शब्दों से कबीर का क्या लेना - देना। ये सब ऊपर-ऊपर की बातें हैं और यही कारण है कि कबीर को बहुत कम लोग समझ पाए। रामानंद जी से दीक्षा लेना चाहते थे पर रामानंद जी मानते नहीं थे तो एक दिन रात के अंधेरे में गंगा घाट की सीढ़ियों पर लेट गए जाकर जिधर से रामानंद जी रोज स्नान करने जाते। अँधेरे में उनका पांव कबीर पर पड गया, सहसा मुँह से निकल गया - राम-राम। कबीर ने पकड़ लिए पाँव कि बस गुरु मन्त्र मिल गया आज से आप मेरे गुरु हुए। साहस की बात थी, रामानंद जी बड़े संत थे कोई उनसे ऐसे कभी मिला न था। मानना पड़ा। बनारस का रहने वाला हो और गंगा घाटों पर विचरण न करे ऐसा कैसे हो सकता था। कबीर अपवाद न थे। पर वहाँ देखा कि लोग बैठे हैं घंटों हाथ में माला लिए, फेरे जा रहे हैं माला तो कहना पड़ा कि ‘ माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ‘। जीवन बीत गया ये माला फेरते - फेरते और न मालूम कितने जन्मों से तुम माला फेरते आ रहे हो कुछ नहीं हुआ और होगा भी नहीं। भगवान को क्या पड़ी है कि तुमने एक सौ आठ बार फेरी कि एक हज़ार आठ बार। वो गिनने थोड़ी बैठा है तुम्हारी माला उसके पास कोई दूसरा काम नहीं है क्या। तुम व्यर्थ ही जनम गँवा रहे हो। अरे ‘ कर की मनका डार दे मन की मनका फेर ‘। छोड़ो ये आडंबर और मन को साधो। मन ही संसार है, इसको साध लिया, इसको काबू में कर लिया तो ही उसे जाना जा सकेगा जो है। उसकी जो महीन सी आवाज है वो तभी सुनाई देगी जब मन का शोर बंद होगा। बैठे हैं हाथ में माला लिए और मन दुकान में लगा है कि आज कितना मुनाफा होगा कि मन दफ्तर में लगा है कि इस बार प्रमोशन लेना ही है। कि मन लगा है किसी स्त्री की ओर कि किसी पुरुष की ओर की उसका संग मिल जाय। तो माला तो चल रही है पर तुम वहाँ मौजूद ही नहीं हो तो माला किस काम की? तुम मन को हटा कर वहाँ मौजूद भर हो जाओ तो वो मिला ही हुआ है तुम भर अनुपस्थित हो। आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद बंदगी से खुदा नहीं मिलता हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से हर साँस ये कहती है हम हैं तो खुदा भी है