एक पुरानी कहावत है कि इस दुनिया में किसी भी बात को ठीक से समझना हो तो सबसे सुगम उपाय है उसे दूसरों को समझाना. जब दूसरे को समझाया जाता है तब एक तटस्थता का भाव पैदा होता है, एक साक्षी भाव का उदय होता है. दूसरा ऐसे ही तो समझ नहीं जायेगा, वो हजार तर्क उठाएगा, विरोध करेगा, इंकार करेगा. तो इस समझाने में उसके सारे इनकारों को खंडित करना पड़ेगा, उसके सारे तर्कों को तोडना होगा, उसके विचार के जाल को काटना पड़ेगा.
एक पुरानी कहावत है कि इस दुनिया में किसी भी बात को ठीक से समझना हो तो सबसे सुगम उपाय है उसे दूसरों को समझाना. जब दूसरे को समझाया जाता है तब एक तटस्थता का भाव पैदा होता है, एक साक्षी भाव का उदय होता है. दूसरा ऐसे ही तो समझ नहीं जायेगा, वो हजार तर्क उठाएगा, विरोध करेगा, इंकार करेगा. तो इस समझाने में उसके सारे इनकारों को खंडित करना पड़ेगा, उसके सारे तर्कों को तोडना होगा, उसके विचार के जाल को काटना पड़ेगा.
एक पुरानी कहावत है कि इस दुनिया में किसी भी बात को ठीक से समझना हो तो सबसे सुगम उपाय है उसे दूसरों को समझाना. जब दूसरे को समझाया जाता है तब एक तटस्थता का भाव पैदा होता है, एक साक्षी भाव का उदय होता है. दूसरा ऐसे ही तो समझ नहीं जायेगा, वो हजार तर्क उठाएगा, विरोध करेगा, इंकार करेगा. तो इस समझाने में उसके सारे इनकारों को खंडित करना पड़ेगा, उसके सारे तर्कों को तोडना होगा, उसके विचार के जाल को काटना पड़ेगा. एक पुरानी कहावत है कि इस दुनिया में किसी भी बात को ठीक से समझना हो तो सबसे सुगम उपाय है उसे दूसरों को समझाना. जब दूसरे को समझाया जाता है तब एक तटस्थता का भाव पैदा होता है, एक साक्षी भाव का उदय होता है. दूसरा ऐसे ही तो समझ नहीं जायेगा, वो हजार तर्क उठाएगा, विरोध करेगा, इंकार करेगा. तो इस समझाने में उसके सारे इनकारों को खंडित करना पड़ेगा, उसके सारे तर्कों को तोडना होगा, उसके विचार के जाल को काटना पड़ेगा.