बुद्ध के समय की ‘जित्वरि’, महाभारत काल की ‘वाराणसी’ और शिव के ‘आनंद-कानन’ को बनारस बनाया यहाँ के लोगों ने। गंगा के किनारे-किनारे पाँच मील की लम्बान में बसे लगभग बेतरतीब गलियों के इस शहर में ऐसा क्या है जो इसे दूसरे शहरों से अलग करता है। इस पर चर्चा होगी और लगातार होगी और इस उम्मीद से होगी कि जहां कुछ ग़लत लगेगा वहाँ आप साधिकार मुझे टोकेंगे और जहाँ ये आपके दिल को छुए, आपके मन को झकझोरे, आपके भीतर कुछ ऐसा भाव जगा दे कि चलो देखते हैं तो आपका आशीर्वाद मुझे मिलेगा। पहले एक बात बता दूँ कि जित्वरि, काशी, आनंद-कानन, और वाराणसी भौगोलिक रूप से एक सीमा में फैले भूखंड को भले कहा जाता हो पर सब एक दूसरे से बहुत भिन्न हैं। पहले बनारस से शुरू करता हूँ। कभी भोरे-भोरे गंगा घाट की ओर जाने वाली किसी गली से गुजरिये, गोबर और प्लास्टिक में लिपटे कूड़े के ढेर से बचते-बचाते और एक आवाज आपका ध्यान आकर्षित करे,……महादेव गुरु! तो समझिए कि ये बनारस है। अगर सामने से एक सफ़ेद धोती में कोई सज्जन अपनी लुटिया से दीवारों में बने विग्रहों पर फूल और जल चढ़ाते दिख जाए तो समझिए कि ये बनारस है। अगर चार फुट की चौड़ी गली में जिसके दोनों और बाइक खड़ी हों और कोई हॉर्न बजाते हुए भी पुकार लगाता मिल जाये कि, ‘भइया तनी जाये दा’ तो समझिए कि ये बनारस है। गली के चबूतरे पर दातून से सूँघनी करता हुआ कोई आवाज लगाये कि, ‘पालागी गुरु’ तो समझिए कि ये बनारस है। ऐसा कहा जाता है कि राजा बनार के नाम पर इसे बनारस कहा जाने लगा लेकिन मुग़ल काल में बनारस नाम अधिक प्रचलित हुआ। लेकिन ये कथा तो ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’ की तर्ज़ पर चलती रहेगी आप को केदार नाथ सिंह की कविता ‘बनारस’ से रूबरू करवाता हूँ जिसका दुनिया की अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ और अमेरिका में एक वृद्ध स्त्री जिसे सुनकर इसलिए रोने लगीं कि अब उन्हें इस जीवन में बनारस जाने का मौक़ा नहीं मिलेगा। इस शहर में बसंत अचानक आता है जब आता है तो मैंने देखा है लहरतारा या मंडुआडीह की तरफ़ से उठता है धूल का एक बवंडर और इस महान पुराने शहर की जीभ किरकिराने लगती है जो है वह सुगबुगाता है जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ आदमी दशाश्वमेध पर जाता है और पाता है घाट का आख़िरी पत्थर कुछ और मुलायम हो गया है सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आँखों में एक अजीब सी नमी है और एक अजीब सी चमक से भर उठा है भिखारियों के कटोरों का खालीपन तुमने कभी देखा है ख़ाली कटोरों में बसंत का उतरना! ये शहर इसी तरह खुलता है इसी तरह भरता और ख़ाली होता है ये शहर इसी तरह रोज़-रोज़ एक अनंत शव ले जाते हैं कंधे चमकती हुई गंगा की तरफ़ इस शहर में धूल धीरे-धीरे उड़ती है धीरे-धीरे चलते हैं लोग धीरे-धीरे बजते हैं घंटे शाम ढेर-धीरे होती है यह धीरे-धीरे होना धीरे-धीरे होने की एक सामूहिक लय दृढ़ता से बांधे है समूचे शहर को इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है कि हिलता नहीं है कुछ भी कि जो चीज़ जहां थी वहीं पर रखी है की पानी वहीं है कि वहीं पर बंधी है नाव कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँ सैकड़ों बरस से कभी सई-साँझ बिना किसी सूचना के घुस जाओ इस शहर में कभी आरती के आलोक में इसे अचानक देखो अद्भुत है इसकी बनावट यह आधा जल में है आधा मंत्र में आधा फूल में है आधा शव में आधा नींद में है आधा शंख में अगर ध्यान से देखो तो यह आधा है आधा नहीं है जो है वह खड़ा है बिना किसी स्तंभ के जो नहीं है उसे थामे है राख और रोशनी के ऊँचे-ऊँचे स्तंभ आग के स्तंभ धुएँ के ख़ुशबू के आदमी के उठे हुए हाथों के स्तंभ किसी अलक्षित सूर्य को देता हुआ अर्घ्य शताब्दियों से इसी तरह गंगा के जल में अपनी एक टांग पर खड़ा है ये शहर अपनी दूसरी टाँग से बिलकुल बेख़बर - (श्री केदारनाथ सिंह द्वारा रचित) कथा जारी है………..