कहाँ है वो काशी जहाँ कलियुग का प्रवेश वर्जित है ? पुराणों के अनुसार प्रथम तीन युगों, सतयुग, त्रेता और द्वापर में काशी प्रकाशित नगर के रूप में उपस्थित रहती है किन्तु कलियुग में यह विलुप्त हो जाती है. कलियुग में हमारी ऑंखें जिस काशी को देखती हैं वो अधिभौतिक है. अध्यात्मिक काशी केवल उन्ही की दृष्टि में आती है जिनकी अंतर्दृष्टि सत्य को देख सकने में समर्थ है. पुराणों के अनुसार काशी क्षेत्र के एक-एक पग में एक-एक तीर्थ की पवित्रता है. (का.ख. 59-118) और काशी कि तिलमात्र भूमि भी शिवलिंग से अछूती नहीं है. महाभारत के वनपर्व 84-18 के अनुसार -- ततो वाराणसी गत्वा देवमर्च्य वृषध्वजं कपिलाहृदमुपस्पृश्यराजसूय फलं लभेत अविमुक्तं समासाद्य तीर्थसेवी कुरुद्वह दर्शनात देवदेवस्य मुच्यते ब्रह्महत्यया वाराणसी जाकर अविमुक्त क्षेत्र में भगवान शंकर की अर्चना करने मात्र से घोर पाप से निवृत्ति होती है. अव्यक्त तथा अनंत परमात्मा के सम्बन्ध में विचार-विमर्श करते हुए अत्रि ऋषि ने महर्षि याज्ञवल्क्य से पूछा कि उस अव्यक्त के बारे में कैसे जाने? इस पर याज्ञवल्क्य ने कहा कि उस अव्यक्त और अनंत परमात्मा की उपासना अविमुक्त क्षेत्र (काशी) में हो सकती है, क्योंकि वह वहीँ प्रतिष्ठित है. इस पर अत्रि ने पूछा कि अविमुक्त क्षेत्र कहाँ है? याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया कि वह वरणा तथा नाशी (असि) नदियों के मध्य है. वह वरणा क्या है ? और वह नाशी क्या है? यह पूछने पर उत्तर मिला कि इन्द्रियकृत सभी दोषों का निवारण करने वाली वरणा है और इन्द्रियकृत पापों का निवारण करने वाली नासी है. वहां ही प्राण के प्रयाण के समय भगवान रूद्र तारक मन्त्र का उपदेश देते हैं. (जाबाल उपनिषद, खंड 1-2) काश्यां मरणान॒ मुक्ति: काशी में मृत्यु होने से मुक्ति की प्राप्ति होती है अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवंतिका पुरी द्वारवती चैव सप्तैता मोक्षदायिका: यदि हम 14तीर्थों एवम् सप्तपुरियों की महत्ता पर तुलनात्मक विचार करें तो देखते हैं कि चारो धामों की यात्रा तथा दर्शन से पुण्य होता है, स्वर्ग तथा अपवर्ग की प्राप्ति होती है, किन्तु मोक्ष नहीं मिलता. यद्यपि सभी पुरियां मोक्षदायिनी बताई गयी हैं, पर काशी को छोड़कर अन्य छह पुरियों में मरने वालों को एक जन्म के लिए पुनः काशी में जन्म लेना पड़ता है, इसके बाद ही उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है. अन्यानि मुक्त क्षेत्राणि काशी प्राप्तिकराणि ही काशी प्राप्त विमुच्येत नान्यथा तीर्थ कोटिभि: करोड़ों तीर्थो के सेवन से जो फल नहीं प्राप्त होता, वह काशी क्षेत्र में मोक्ष प्राप्ति के अनंतर प्राप्त होता है. इसका कारण शायद ये है कि इन छ: पुरियों की उत्पत्ति तथा उनका लय काशी में ही माना गया है. काश्या: सर्वा नि:सृता: सृष्टिकाले काश्यामन्त: स्थिति काले बसन्ति काश्यां लीना: सर्वसंहारकाले ज्ञातव्यास्ता: मुक्तपुर्यो भवन्ति सृष्टि काल में सभी तीर्थ एवं पवित्र क्षेत्र काशी से ही उद्भूत होते हैं और प्रलयकाल में उसमे ही लीन हो जाते हैं. इतना ही नहीं, काशी में ही इनका निरंतर वास माना जाता है और इनकी अपनी-अपनी ऋतुयात्राएँ भी होती हैं. काश्यां नवौषरा: सप्तपुर्य: सन्तिसमागताः (ब्र.वै.पु. का.र. 2-13-14) काशी काशीति बहुधा संस्मरज: न पश्यतीहि नरकान् वर्त्मनान्वयम कृतान् काशी काशी काशी इस प्रकार बहुधा तन्मय चित्त से स्मरण करते रहने से ही पूर्वसंचित दुष्कर्म का भोग नहीं होता, परम मंगल होता है.

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