एक बार मैं किसी ट्रेनिंग के सिलसिले में यूनियन बैंक के मुंबई स्थित डी.आई.टी गया हुआ था. लंच में हम लोग अपने-अपने कूपन के साथ लाइन में लगे थे. मेरे बड़े-बड़े बाल और दाढ़ी देखकर कैंटीन के संचालक ने, जो दक्षिण भारतीय थे, मुझसे पूछा कि किधर से आया। मैंने बताया कि काशी से आया हूँ तो उन्होंने मेरे पैर छुए और मेरे सीनियर्स के सामने कहा कि आप बैठो मैं खाना लेके आता। आख़िर क्या है इस काशी में ? आज काशी नाम वाराणसी या बनारस का पर्याय बन गया है पर सदा से ऐसा नहीं था। काशी भारत के सोलह जनपदों में से एक थी जिसकी सीमा आज के कानपुर और कन्नौज से लगती थी। हालाँकि कालांतर में काशी और वाराणसी एक दूसरे के पर्याय हो चुके हैं। पाणिनि ने अपनी अष्टाध्यायी ( 4.2.116) तथा पतंजलि ने अपने महाभाष्य में काशी का उल्लेख किया है।मैं भी यहाँ काशी, वाराणसी या बनारस को एक मानकर ही चर्चा करूँगा ताकि किसी प्रकार के विभ्रम या संदेह की कोई गुंजाइश न रहे। मेरे जीवन में काशी का प्रसंग मार्क ट्वेन के इस कथन से हुआ कि, “बनारस इतिहास से भी पुराना है, परंपरा से भी पुराना है, किंवदंती से भी पुराना है और इन सभी को मिलाकर देखने पर इससे भी दोगुना पुराना लगता है।” इस हिसाब से काशी आज की तिथि में विश्व का सबसे पुराना जीवित नगर होना चाहिए लेकिन वास्तविकता में विश्व के रिकॉर्ड्स में इसका कहीं तीसरा और कहीं पाँचवा और कहीं तो दसवां स्थान है। दमस्कस को दस हज़ार साल पुराना और एथेंस को सात हज़ार साल पुराना बताया जाता है जबकि बनारस को पाँच हज़ार साल पुराना बताते हैं। कुछ पश्चिमी इतिहासकार तो बनारस को केवल तीन हज़ार साल पुराना ही बताते हैं। इसके दो प्रमुख कारण हैं, पहला भारतीयों में काल और तिथि क्रमानुसार इतिहास लिखने की परम्परा नहीं रही है और इसी का फ़ायदा उठा कर पश्चिम के इतिहासकारों ने बनारस के इतिहास को भी अपने ढंग से तोड़ मरोड़ कर लिखा और भारत के लोगों ने इसे स्वीकार भी कर लिया। दूसरे, पुरातात्विक खुदाई के कार्य उतनी त्वरा और गंभीरता से नहीं किए गए और जहां पर खुदाई हुई भी वहाँ किसी ठोस परिणाम पर पहुँचने के पहले ही बंद कर दी गई। राजघाट क्षेत्र में और अधिक खुदाई करने की आवश्यकता है क्योंकि पुराने बनारस के काल खंड का निर्धारण करने के लिए ये बहुत आवश्यक है। मैंने इस संदर्भ में एक पत्र प्रधानमंत्री जी के नाम भी लिखा था परंतु उसका कोई परिणाम नहीं निकला। बनारस इतना पुराना शहर होने के बाद अभी तक विश्व हेरिटेज शहरों में शुमार नहीं हो सका है। यदि इसे तीसरा सबसे पुराना नगर भी माना जाये तो इस लिहाज़ से इसको विश्व हेरिटेज की सूची में होना चाहिए ताकि इसके इतिहास की और गहराई से पड़ताल हो सके। ख़ैर विषय थोड़ा गंभीर हो गया पर ये तो चलता रहेगा क्योंकि बनारस है ही ऐसा कभी मौज-मस्ती और कभी अध्यात्म का अद्भुत संगम है ये शहर जिसके एक-एक कोने-अँतरे की पड़ताल करते चलेंगे। श्रीजी की मलइयो से नीलू की कचौड़ी का मजा आपको मिलेगा।सभ्यता के उत्तुंग शिखर के दर्शन होंगे तो वो काल खंड भी आएगा जब बनारस में एक भी शिवाला नहीं था। आज की कथा श्री अष्टभुजा शुक्ल की कविता के साथ विराम को प्राप्त होगी अगली कहानी के इंतज़ार में - यह बनारस है ————— सभ्यता का जल यही से जाता है सभ्यता की राख यहीं आती है लेकिन यहाँ से सभ्यता की कोई हवा नहीं बहती न ही यहाँ सभ्यता की कोई हवा आती है यह बनारस है चाहे सारनाथ की ओर से आओ या लहरतारा की ओर से वरुणा की और से आओ या गंगा की ओर से इलाहाबाद की ओर से आओ या मुगलसराय की ओर से डमरू वाले की सौगंध यह बनारस यहीं और इसी तरह मिलेगा ठगों से ठगड़ी में सन्तों से सधुकड़ी में लोहे से पानी में अंग्रेजों से अंग्रेज़ी में पंडितों से संस्कृत में बौद्धों से पाली में पंडों से पंडई और गुंडों से गुंडई में और निवासियों से भोजपुरी में बतियाता हुआ यह बहुभाषाई बनारस है। क्रमशः जारी……… #banaras #kashi #ghat #pandit