आई.सी.यू. में आये उसे कितने दिन हो गये हैं? दिनों की गिनती और तारीख़ अब उसके लिए अर्थहीन हो चुके हैं। यहाँ आई.सी.यू. में रात और दिन में कोई अन्तर नहीं पता चलता। चौबीस घंटे सफेद दूधिया रोशनी से रोशन रहता है ये हिस्सा लेकिन एक दमघोंटू सन्नाटा यहाँ हमेशा व्याप्त रहता है। केवल डॉक्टरों और नर्सों की बात-चीत और आवाजाही से ये सन्नाटा टूटता है। हर बिस्तर पर लेटा हुआ मरीज़ मृत्यु से संघर्ष कर रहा है, वो जो निश्चित है उसे टालने की कोशिश हर पल यहाँ जारी रहती है। अधिकतर मरीज़ यहाँ अचेतावस्था में ही होते हैं जो भीतर से इस लड़ाई को लड़ रहे होते हैं लेकिन जो होश में होते हैं उन्हें दोहरी लड़ाई लड़नी पड़ती है। हर दो-तीन घंटे में कोई न कोई मरीज़ इस लड़ाई में हार जाता है उस समय डॉक्टरों और नर्सों की फुसफुसाहट बढ़ जाती है उनके तेज कदमों की आहट से पता चल जाता है कि कोई फिर इस जंग को हार रहा है। मरीज़ के तीमारदारों को एक-एक कर के ही आने की अनुमति है और वो भी तेज-तेज नहीं बोल सकते। कभी कभी उनकी घुटी-घुटी सिसकियाँ इस सन्नाटे को और भयावह बना देती है। उसके इस रोग का जब तक पता चला तब तक ये शरीर के बहुत से हिस्सों को अपनी खूनी गिरफ़्त में ले चुका था। कई दिन तो तमाम प्रयासों के बावजूद खून का बंद नहीं हो रहा था और डॉक्टरों ने भी उम्मीद छोड़ना शुरू कर दिया था। लेकिन जब तक साँस चल रही थी उन्हें प्रयास करना था। हमारे यहाँ कहते भी हैं कि ‘जब तक साँस तक तक आस’।डॉक्टरों की मेहनत कहें या विधि का विधान, खून का बहना रुक गया तो उनके भी हौसले एक बार बढ़ गये। यही वो समय होता है जब पूरी तरह विज्ञान में विश्वास करने वाला व्यक्ति भी किसी अदृश्य शक्ति में भरोसा करने लग जाता है। मैं भी, जो अब तक अचेत पड़ी हुई थी वापस होश में आ गई लेकिन आई.सी.यू. से बाहर निकालने की स्थिति नहीं थी अभी भी संशय बरकरार था और मैं एक ऐसी मनःस्थिति में थी जिसको सिर्फ़ वही समझ सकता है जो इस हालत से गुजरा हो, जिसे आसन्न मृत्यु प्रति-पल उसकी आँखों के सामने मंडरा रही हो। मेरे पति भी गाँव से आ गए थे। बेटे ने मुझे लाकर यहाँ भर्ती किया है, मेरी बेटी इसी शहर में है तो इन लोगों के खाने-पीने की समस्या नहीं है। मैं सोचने लगती हूँ कि जिनका कोई ठिकाना नहीं होता होगा उन्हें कितनी परेशानियों से गुजरना पड़ता होगा। किराए का कमरा, होटल का खाना और प्रतिपल मृत्यु से दो-चार करता उसका कोई अपना। कैसी दारुण अवस्था होती होगी उसके मन की और ऊपर से लगातार पैसों की व्यवस्था करने में सब कितना टूट जाते होंगे। शुरू-शुरू में जब मुझे अपनी बीमारी का पता चला तो सहसा विश्वास ही नहीं हुआ। लेकिन जब लोकल डॉक्टरों ने कहा कि तुरन्त शहर के बड़े अस्पताल ले के जाओ तब तब इसकी भयावहता का मुझे आभास हुआ। कितनी सहज ज़िंदगी चल रही थी, संघर्ष तो था पति के काम में हाथ बटाने के अलावा मैं सिलाई करके कुछ अतिरिक्त आय की व्यवस्था हो जाये।लेकिन मेरे भर्ती होते ही पति का भी काम बंद हो गया है और मेरा भी। एक तरफ़ अस्पताल के खर्चे बढ़ते जा रहे थे और दूसरी तरफ़ आय के सारे स्रोत बंद हो गये थे। पति और बच्चे जब भी मिलने आते तो भरसक कोशिश करते कि मुझे इन आर्थिक परेशानियों की भनक न लगे पर उनके चेहरे के पीछे की घोर उदासी मुझसे छिपी नहीं रह सकती थी आख़िर एक को मैंने जन्म दे कर बड़ा किया था और दूसरे के साथ भी बत्तीस बरस गुजार चुकी हूँ उनकी रग-रग से वाक़िफ़ हूँ। उनके लाख कोशिश करने के बावजूद उनकी लाचारगी उनके चेहरे पर साफ़ पढ़ी जा सकती थी। मैं मन ही मन भगवान से प्रार्थना कर रही हूँ कि भगवान जितना जल्दी हो सके मुझे उठा ले वरना मुझे जीवन देने की जद्दो-ज़हद में इनका शेष जीवन भी नर्क हो जाएगा। तभी देखती हूँ कि बेटा मेरे पास आ रहा है लेकिन आज उसके चेहरे पर पर वो उद्विग्नता नहीं है जो रोज़ रहती थी। वो बोला, माँ आप जिस टीचर आंटी के कपड़े सिलती थीं उनका फ़ोन आया था कि वो कुछ पैसे भेज रही हैं किसी के हाथ। मेरे हाथ उनके लिए दुआ में उठ गये।आपका किया इसी संसार में फलता है, उनकी बीमारी में उनकी मैंने सेवा की थी जिसका प्रतिफल मुझे आज मिल रहा था।