सूरज दिन भर ताप बिखेरने के बाद आहिस्ता-आहिस्ता अस्ताचल की ओर बढ़ रहा था थका हुआ, क्लान्त और उदास. शाम धीरे-धीरे उतर रही थी और सूरज की किरणें गंगा में घुल कर विलीन हो रही थीं. गंगा तट पर बैठी रेखा गंगा की लहरों में अपने बीते दिनों की कथा को भी बहते हुए देख रही थी. गंगा इतनी शांति के साथ बह रही थीं जैसे शाम की सारी उदासी को अपने आँचल में समेट कर उसे दूर बहा ले जाना चाहती हों. पर रेखा के मन में विचारों की तरंगे ज्वार-भाटा की तरह उछल-उछल कर उसके पूरे वजूद को भिगो रही थीं. घाट का ये वही स्थान था जहाँ वो अरूप के साथ घंटों बैठी रहती थी इस प्रत्याशा में कि समय थम जाए और वो बस बैठी रहे, बैठी रहे हमेशा-हमेशा. हवा ठंढ़ी हो चली थी और विचारों के बादल रुई के फाहों की तरह उसके चित्ताकाश में उड़ने लगे. पढने में ज़हीन रेखा ने इंटर खूब अच्छे नंबरों से पास किया था और स्कूल की सीमित चहारदीवारी से कॉलेज के उन्मुक्ताकाश में पहुँच गयी थी. नए लोग, नया वातावरण, लड़के लड़कियां एक दूसरे से बात-चीत और चुहल करते हुए. अभी तक वो गर्ल्स स्कूल में थी जहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था. कुछ दिन लगे फिर अनेक लड़कियों से उसकी मित्रता हो गयी. उसने महसूस किया कि खाली समय में लड़कियों की बात-चीत का एक ही विषय अधिक रहता कि किसका बॉय फ्रेंड कैसा है या किसका किसपे क्रश है. उसे सब थोडा अजीब लगता पर भीतर से अच्छा भी लगता पर कुछ था जो उसे ये सब करने से रोकता था. कुछ लड़कों ने दोस्ती का हाथ बढाया भी पर रेखा लड़कों के साथ दोस्ती करने में सहज नहीं थी इसलिए वो खुद को हेलो हाय तक सीमित रख रही थी. सेशन शुरू हुए दो तीन महीने बीत चले थे और पढाई अपनी रफ़्तार पकड़ चुकी थी. दो पीरियड्स के बीच अगर अधिक गैप होता तो ये समय वो अक्सर लाइब्रेरी में बिताती थी. एक दिन लाइब्रेरी में वो रैक से कोई किताब निकालने का प्रयास कर रही थी पर रैक की ऊंचाई कुछ अधिक होने से उसे थोड़ी परेशानी हो रही थी तभी एक हाथ उसके बगल से उठा और किताब को उतार कर उसके सामने कर दिया. उसने चिहुंक कर एक बार किताब की ओर देखा और फिर किताब उतारने वाले को. लम्बा कद, गेहुँआ रंग, आधे से अधिक चेहरा दाढ़ी से आवृत्त. डेनिम की पैंट और काले रंग की टी-शर्ट में स्मार्ट लग रहा था वो. मुस्कुराते हुए वो बोला, हाय मैं अरूप, थर्ड इयर में हूँ. रेखा जड़ हो गयी थी थोड़ी देर के लिए, क्या कहूँ? तब तक अरूप ने हाथ बढ़ा दिया था. रेखा का हाथ भी स्वतः उठ गया. अरूप के बलिष्ठ हाथों में उसका हाथ जैसे खरगोश का छोटा सा बच्चा कुलबुलाया हो. हिम्मत करके उसने कहा, हाय, मैं रेखा, फर्स्ट इयर में हूँ. इतना कह कर रेखा वहां से भाग ली. लेकिन दूसरे दिन जब वो लाइब्रेरी में पहुंची तो अनायास ही उसकी ऑंखें किसी को तलाशने लगीं. और उधर अरूप तो जैसे उसका इंतजार ही कर रहा था. रेखा के लाइब्रेरी में घुसते ही अरूप उसके पास आया और बोला हेलो रेखा जी कोई किताब निकालनी हो तो बंदा सेवा में हाजिर है. रेखा ने हिचकने का अभिनय किया फिर बोली, ठीक है मेरे साथ अन्दर चल कर अमृता प्रीतम की रसीदी टिकट खोजने में मदद करो. मुझे अमृता जी का लेखन बहुत पसंद है. इस पर अरूप ने अपनी गोल-गोल आंखे नचाकर कहा, अमृता जी का जीवन भी पसंद है तुम्हे? रेखा ने कोई जबाब दिए बिना अपने कदम लाइब्रेरी के साहित्य वाले सेक्शन की ओर बढ़ा दिए. रेखा को अब अरूप का साथ अच्छा लगने लगा था. इन मुलाकातों का सिलसिला लाइब्रेरी की चहारदीवारी को लाँघ कर रेस्टोरेंट और माल तक पहुँच गया. दोनों अक्सर ही साथ दिखाई देने लगे. पहले सहेलियों से जिस दोस्ती को रेखा ने छुपाया था वो अब टॉक ऑफ़ द कॉलेज हो गया. सहेलियां उसे चिढ़ातीं कि हमारी शीरी ने अपना फरहाद खोज लिया चुपके-चुपके और हमें भनक भी नहीं लगी. छोटे शहर में एक खासियत होती है, कुछ भी अधिक दिन तक छुप नहीं सकता. रेखा की इस खास दोस्ती की खबर उसके मम्मी-पापा तक भी पहुँच गयी. आजकल के माँ-बाप भी अब उतने पुराने खयालात के नहीं रह गए है. रेखा की मम्मी ने कहा कि अपने दोस्त से हमें भी मिलवाओ किसी दिन. माँ का सकारात्मक रूप देखकर रेखा की जान में जान आ गयी और एकदिन उसने अरूप को अपने यहाँ डिनर के लिए बुला लिया. उसके मम्मी पापा को भी अरूप पसंद आया. लड़का देखने में भी सुन्दर था और पढने में भी जहीन. एक माँ-बाप को इससे बड़ा संतोष क्या हो सकता है कि उसका बच्चा सही दिशा में है. रेखा के मम्मी-पापा को इस दोस्ती में कोई खोट नज़र नहीं आयी. पिता लोग अक्सर ऐसे मामलों में माओं पर अधिक भरोसा करते हैं कि शेष उंच-नीच तो वो समझा ही देंगी. रेखा की माँ यद्यपि आधुनिक विचारों की थीं पर भारतीय संस्कार, जहाँ कि सेक्स की बात आज भी वर्जित है, उन्हें सीधे-सीधे रेखा को कुछ कहने से रोक रहे थे. फिर भी उन्होंने इशारो-इशारों में रेखा को समझाने का प्रयास किया कि सब बात ठीक है पर दोस्ती की सीमा का अतिक्रमण मत करना क्योंकि बहुत से कार्य शादी के बाद ही शोभा देते हैं. उधर रेखा और अरूप की नजदीकियां बढ़ती जा रही थी. एक दो बार रेखा ने कहा भी अरूप से कि वो अपने मम्मी-पापा से उसे मिलवा दे पर वो हर बार इसे टाल जाता. पर रेखा उसके हर तर्क से संतुष्ट हो जाती. ये उम्र ऐसी ही होती है जहाँ प्रेमी की हर बात गीता के श्लोक जैसी लगती है. इसी बीच रेखा की सेमेस्टर परीक्षाएं शुरू हो गयीं. रेखा को अपनी पढाई पर ध्यान देना जरुरी हो गया तो अरूप के साथ उसकी मुलाकातें कुछ कम हो गयीं. एक दिन उसकी मम्मी ने कहा कि उन लोगों को रेखा के चाचा की बेटी के तिलक में जाना होगा जो बगल के शहर में रहते थे. रेखा ने कहा- मम्मी एग्जाम के कारण मैं नहीं जा पाऊँगी तुम और पापा हो आओ. एक दिन कि बात है मैं रह लूंगी. मम्मी बोलीं - ठीक है मैं सक्सेना आंटी को बोल दूंगी वो आकर तुम्हारे साथ सो जाएंगी. नहीं माँ तुम चिंता मत करो मैं अकेले रह लूंगी, आंटी बहुत बात करती हैं बेकार में पढ़ने में डिस्टर्ब होगा. मम्मी-पापा के चले जाने के बाद रेखा अपनी पढाई में लग गयी. तभी अरूप का मेसेज फ़्लैश हुआ, क्या कर रही हो? पढ़ रही हूँ यार कल एग्जाम है और क्या, उसने भी टाइप कर दिया.. हाँ मम्मी-पापा एक रात के लिए बगल के शहर गए हैं वहां मेरी चचेरी बहन का तिलक है. फिर वो अपनी पढाई में व्यस्त हो गयी. रात आठ बजे घर की कॉल-बेल बजी. कौन हो सकता है? दूध वाला भी तो आ के चला गया. उसने की होल से झाँका. बहार अरूप खड़ा था कई कागज के ठोंगे हाथ में पकडे हुए. ये इस समय यहाँ क्या कर रहा है? ये सोचते-सोचे उसने दरवाजा खोल दिया. अरूप ठोंगों से लदा-फंदा भीतर आ गया और सारे ठोंगे मेज पर रखकर धम्म से सोफे पर पसर गया. रेखा अचकचा गयी थी पहले फिर थोड़ी संयत हुई तो बोली- कल पेपर है यार आज गप्पें मरने का समय नहीं है. अरूप ने कहा - कुछ खाने का सामान लाया हूँ तुम और मैं बैठ के खा लेते हैं फिर मैं चला जाऊंगा. दोनों ने बैठ कर समोसे और छोले खाए. रेखा चाय बना लायी. चाय पीने के बाद अरूप ने कहा कि अब तुम पढाई करो मैं चलता हूँ कल एग्जाम के बाद मिलना. रेखा उसे दरवाजे तक छोड़ने आई. बाहर जाते-जाते अरूप मुड़ा और उसने रेखा के अधरों पर अपने अधर आहिस्ता से रख दिए. एक हलकी सी छुवन और जब तक रेखा कोई प्रतिक्रिया देती वो सड़क के अँधेरे में गुम हो गया. रेखा हतप्रभ खड़ी रह गयी दरवाजे पर. उसकी चेतना थोड़ी देर के लिए लुप्त हो गयी थी. दरवाजा बंद करके वो भीतर लौटी पर उसकी चाल डगमगा रही थी. एकाएक उसे बहुत जोर का गुस्सा आया और उसकी आँखों से आंसू झरने लगे. उसे अरूप से इस व्यवहार की बिलकुल की अपेक्षा नहीं थी. आगे उसका पढने में मन नहीं लगा. जब भी किताब खोलती तो पन्नों के स्थान पर दो अधर आपस में जुड़े दिखाई पड़ने लगते और सारे अक्षर धुंधला जाते. थोड़ी संयत हुई तो सोचना शुरू किया कि ये गलत था या सही. सारी रात अरूप के अधरों का स्पर्श उसके अधरों पर महसूस होता रहा. अब उसे सब सोच कर एक मीठी सी सिहरन होने लगी. सारी रात आँखों में गुजर गयी. दूसरे दिन परीक्षा हाल से बाहर आते ही दूर एक पेंड़ के तने से टिका अरूप दिखाई पड़ गया था. रेखा के पाँव अनायास उधर बढ़ गए. लेकिन जब वो वहां पहुंची तो अरूप से नज़र नहीं मिला पा रही थी. अरूप भी शायद कुछ गिल्ट में था, दोनों की नजरें मिलीं और फिर जमीन पर धंस गयी. रेखा को ही कहना पड़ा कि चलो कैंटीन में चलते हैं. कैंटीन में बहुत शोर था, लड़के-लड़कियों के ठहाकों से गुंजायमान. कोने की एक मेज पर दोनों बैठे तो अरूप ने नजरें नीचे किये हुए ही कहा, यार कल के लिए सॉरी. रेखा ने कुछ कहा नहीं बस उसके अधरों पर एक स्मित सी मुस्कान आयी और तत्क्षण विलीन भी हो गयी. उस दिन के उस अधर स्पर्श ने रेखा के जीवन में उथल-पुथल मचा दिया था. एक शीतल सी आग उसके भीतर लगातार दहकती रहती. वो अपनी पूरी ताकत से मन में उठती इच्छाओं के खिलाफ संघर्ष कर रही थी. पर ये संघर्ष उसे भीतर ही भीतर मथ रहा था. वो अक्सर खुद से सवाल करती कि क्या ये केवल देह का आकर्षण है? फिर खुद ही उत्तर देती कि नहीं ये प्रेम है जो अपनी मंजिल की तलाश में है. सवालों-जबाबों की ये आंधी उसके भीतर चलती रहती. एक दिन वो कॉलेज से लौटी तो माँ-पापा को कहीं जाने के लिए तैयार देखा. आप लोग कहीं जा रहे हैं ? बेटा तुम्हारी दादी की तबियत अचानक ख़राब हो गयी है हम वहीँ जा रहे हैं, कल वापस आ जायेंगे, माँ ने कहा. रात भर की बात है, तुम कहो तो सक्सेना आंटी को बोल दूँ, माँ ने चिंता जताई. अरे माँ मैं अब इतनी छोटी थोड़े हूँ, हॉस्टल में, पी.जी. में लड़कियां अकेले ही रहती हैं न? आप लोग जाओ और हाँ पहुँच कर दादी की तबियत के बारे में मुझे भी बता देना नहीं तो सारी रात उन्ही के बारे में सोचती रहूंगी. माँ-पापा के जाने के बाद रेखा ने खुद के लिए चाय बनाई और बरामदे में बैठ कर चाय का आनंद लेने लगी. फिर उसने मोबाइल उठाया और अरूप को मैसेज किया- शाम को घर आ सकते हो? रात आठ से पहले खाली नहीं हो पाऊंगा उसके बाद आता हूँ - उसका जबाब आया. कुछ खाने के लिए मत लाना मैं घर पर ही कुछ बना रही हूँ. रेखा ने ये टाइप किया और उठ गयी. उसने सोचा कि अभी साढ़े पांच ही बजे हैं और अरूप के आने में देर है तब तक कुछ अच्छा सा बना लेती हूँ जो अरूप को पसंद है. अरूप आठ की जगह साढ़े आठ बजे आया. चेहरे पर थकन के लक्षण दिखाई पड़ रहे थे. रेखा के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आयीं -क्या बात है चेहरा क्यों उतरा हुआ है तुम्हारा? उसने पूछा. सोफे पर ढेर होता अरूप बोला-मत पूछो यार आज सारा दिन बिजली विभाग के ऑफिस में धक्के खाए एक बिल को सुधरवाने के चक्कर में फिर एक दोस्त को देखने अस्पताल जाना पड़ा. बस अभी-अभी खाली हुआ और सीधा इधर ही आ गया. रेखा ने आश्वस्त होते हुए कहा, तो ठीक है तुम मुह हाथ धो लो मैं तुम्हारे लिए चाय बनाती हूँ. अचानक अरूप ने पूछा-अंकल आंटी नहीं दिख रहे हैं, कही गए हैं क्या? अरे हाँ मैं तुम्हे बताना ही भूल गयी माँ-पापा आज गाँव गए हैं दादी जी की तबियत ठीक नहीं है - रेखा ने बताया. जब तक रेखा चाय बना के लाई अरूप मुह हाथ धोकर वापस सोफे पर पसर गया था और मोबाइल में कुछ देख रहा था. रेखा चाय के साथ सैंडविच भी बना लाइ थी. ट्रे को मेज पर रख कर वो भी अरूप के बगल में बैठ गयी. दोनों चुप-चाप खाने लगे एक मौन उनके बीच कुछ देर तक पसरा रहा. चाय अच्छी है अरूप ने मौन तोड़ा. रेखा ने जैसे सुना ही नहीं, वो अभी भी किन्ही ख्यालों में गुम सैंडविच को कुतर रही थी लेकिन साफ़ लग रहा था कि वो भीतर के किसी भावावेग से लड़ रही थी. अरूप ने उसे कंधे से पकड़ा और उसकी आँखों में झांकते हुए पूछा, क्या बात है रेखा, तुम अचानक इतनी चुप क्यों हो? रेखा ने कुछ कहा नहीं बस अरूप के गालों को अपने दोनों हाथों में भरते हुए अपने तप्त अधर अरूप के अधरों से सटा दिए. उनकी सांसे गरम होती गयीं और चाय पड़ी-पड़ी ठंढी होती रही. बड़े जातां से खड़ी की गयी संयम की दीवार एक झटके में ढह गयी थी. पर उनकी आँखों में पछतावा नहीं था आज नहीं तो कल एक होना ही है. कुछ देर बाद अरूप विदा हो गया और रेखा उन क्षणों को रात भर बार-बार जीती रही. वार्षिक परीक्षाएं आने वाली थीं. अरूप और रेखा पढाई में अधिक समय देने लगे. अरूप के लिए तो और भी महत्वपूर्ण था क्योंकि ये उसका फाइनल इयर था. फोन पर भी बात करने के बजाय दोनों चैट कर लेते और फिर अपनी पढाई में मशगूल हो जाते. परीक्षाओं के तुरंत बाद में रेखा की चचेरी बहन की शादी थी. वो उसके तिलक में नहीं जा पायी थी तो बहन वैसे ही नाराज थी, उसने साफ़-साफ़ कह दिया था कि दस दिन पहले से आ जाना नहीं तो अपनी बहन को भूल जाना. उसने तो एग्जाम के बाद अरूप के साथ थोड़ा अधिक समय बिताने का तय किया था पर बहन को और अधिक नाराज़ नहीं कर सकती थी. जाने के पहले वो और अरूप गंगा के इसी घाट पर घंटों बैठे रहे थे. दोनों के हाथ एक दूसरे से गुंथे हुए थे. गंगा की लहरें शांत थीं और ये बता पाना मुश्किल था कि पानी बह भी रहा है या नहीं. वो दोनों भी ऊपर से शांत थे पर भीतर कुछ बह रहा था जो शब्दों से परे था. ये कहना भी मुश्किल था कि दोनों के भीतर एक ही धारा थी या अलग-अलग. रेखा का सिर धीरे से झुका और अरूप के कंधे से टिक गया, उसने ऑंखें बंद कर लीं और उसने देखा कि उसके भीतर भी कुछ बह रहा है बिलकुल गंगा के समानांतर. काफी देर तक दोनों ऐसे ही बैठे रहे मौन जैसे अगर कुछ बोला तो घाट की शांति में बाधा पड़ जाएगी. कुछ देर बाद अरूप ने रेखा के सिर को बहुत हौले से उठाया जैसे किसी फूल की डाली को उठा रहा हो. उसकी उनीदीं आँखों में उसने अपनी आंखे टिका दीं. उसके होठ कुछ फड़फड़ाये जैसे कुछ कहना चाहता हो पर कह नहीं पा रहा हो. रेखा थोड़ी सजग हुई और उसके माथे पर एक प्रश्नचिन्ह उभर आया, हाँ कहो न अरूप तुम कुछ कह रहे थे? अरूप ने जो कहा उसको सुनने के बाद रेखा को ऐसा लगा कि उसके भीतर कुछ छनछना कर बिखर गया. अरूप कह रहा था कि हायर स्टडीज के लिए उसे अगले हफ्ते ही इंग्लैंड जाना होगा. पर तुमने पहले तो कभी बताया नहीं? ये सवाल रेखा की आँखों ने पूछा था. पापा ने कहा था कि जब तक एडमिशन न हो जाय किसी को बताना ठीक नहीं होगा. अरूप खुद ही जबाब दे रहा था. पर यार दो साल की तो बात है चुटकियों में बीत जायेंगे, फिर वापस आते ही हम दोनों शादी कर के अपनी छोटी सी दुनिया बसा लेंगे. रेखा, जो अब तक हतप्रभ सी बस उसे सुने जा रही थी, ने बस इतना ही कहा, तुम लड़कियों की मनोदशा को नहीं समझ सकते. तुम्हारे लिए ये केवल दो साल मेरे लिए दो जन्म के बराबर होंगे. पर जो होना था वही हुआ. अरूप अपने कैरियर को कोरी भावुकता की भेंट नहीं चढ़ा सकता था. इधर रेखा अपनी बहन की शादी में गयी और उधर अरूप ने इंग्लैंड की राह पकड़ी. अब तो इन्टरनेट कॉल ही रेखा के जीने का सहारा रह गयी थी. अरूप कभी-कभी बहुत व्यस्त हो जाता तो मैसेज के जबाब भी नहीं दे पाता था. बाद में सॉरी, रूठना मनाना चलता. रेखा ने वो कॉलेज छोड़ दिया. सहेलियों के सवालों का जबाब देना उसे अन्दर तक चीर जाता. उसने एक दूसरे कॉलेज में पी जी में एडमिशन ले लिया. अरूप के गए धीरे-धीरे एक साल बीत गया. उसके प्रोजेक्ट्स उसे अधिक व्यस्त रखने लगे थे. कॉल्स और मेसेजेस की आवृत्ति घटने लगी. रेखा शिकायत करती तो वो समझाने के लहजे में कहता, अरे यार रेखा थोड़ा प्रैक्टिकल बनो इतनी कोरी भावुकता आदमी के विकास में बाधा बन जाती है. इसी बीच उसकी एक सहेली भी अरूप के ही कॉलेज में पढ़ने पहुँच गयी. उससे उसे अरूप की ख़बरें मिल जातीं. एक दिन जब उसकी सहेली ने कुछ फोटोज भेजे तो रेखा के पांवों के नीचे की धरती ही खिसक गयी. उन तस्वीरों में अरूप एक गोरी लड़की के साथ था पूरी तरह बेतक्कलुफ, हाथ में हाथ डाले, एक दूसरे से आलिंगनबद्ध, किस करते हुए. अरूप के बार-बार प्रैक्टिकल बनने के के पीछे का सच उसके सामने एकदम नग्न खड़ा हो गया. उसने वो फोटोज अरूप को भेज कर कैफियत दरियाफ्त की तो वो भड़क गया कि, तो तुम अब मेरी जासूसी भी कर रही हो? मैं जासूसी नहीं कर रही हूँ पर इन फ़ोटोज के पीछे का सच जानने का अधिकार है मुझे, रेखा झल्लाती. ये अधिकार तुम्हे किसने दिया? अरूप ही पलटवार करता. तो या जो हमारे बीच जो कुछ था वो सब झूठ था? रेखा की आँखों से परनाले बह उठते पर अरूप पर इसका कोई असर नहीं होता. देखो रेखा हमारे बीच जो भी हुआ वो हम दोनों की सहमती से हुआ था और उसमे कोई शर्त नहीं थी. जो हुआ उसे भूल जाओ और अपनी जिंदगी में आगे बढ़ो. मुझे यहाँ जॉब मिलने वाली है और मेरा वापस आने का कोई इरादा नहीं है - अरूप उसे समझाने के अंदाज में कहता. फिर बातें छोटी होती गयीं और दरारें बड़ी. रेखा के सामने अरूप के साथ बिताये गए अन्तरंग क्षण काली परछाइयों की तरह उसे घेर लेते और विद्रूप से उसका अस्तित्व किरचें-किरचें बिखर जाता. फर्स्ट इयर की परीक्षा उसने किसी तरह दी लेकिन उसका मानसिक संताप इतना बढ़ गया कि उसे बुखार आने लगा. बहुतेरे टेस्ट कराये गए पर शरीर में कोई बीमारी हो तब न निकले. वो मन ही मन घुट रही थी और उसके पास कोई नहीं था जिससे वो अपना दुःख, अपनी पीड़ा, अपना संताप साझा कर सकती. फिर एक दिन निदा फाजली की एक ग़ज़ल उसकी आँखों के सामने से गुजरी- कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो जहाँ उमीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता कहाँ चराग़ जलाएँ कहाँ गुलाब रखें छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं ज़बाँ मिली है मगर हम-ज़बाँ नहीं मिलता उसे लगा कि उसे अपनी दुश्वारियों का जबाब मिल गया हो जैसे. अब उसे माँ की बातों का अर्थ समझ में आया था पर बहुत देर हो चुकी थी. ये जवान होते हुए बच्चों की सबसे बड़ी समस्या है कि माता-पिता जब उन्हें समझाते है तो उन्हें लगता है कि वो उनके दुश्मन हैं और उनको समझने में उनसे भूल हो रही है. और जब उन्हें अहसास होता है कि वो उनके दुश्मन नहीं हैं बल्कि वो अपने अनुभव का लाभ उनको देना चाहते है तब तक कई बार देर हो चुकी रहती है. उन्हें ये बात कौन समझाए कि कौन माता-पिता अपने बच्चे का बुरा चाहेंगे. आखिरकार रेखा ने हिम्मत जुटाई और एक शाम मम्मी को सारी बात बता दी. अपनी कहानी बता देने के बाद वो माँ की गोद में सर रखकर घंटों सुबकती रही पर जब उसने गोद से सिर उठाया तो उसे लगा कि उसके सिर पर रखा बोझ उतर गया है. मम्मी ने कहना शुरू किया. बेटा मैंने तो तुम्हे पहले ही आगाह किया था. आजकल जो ये चलन चल गया है बॉय फ्रेंड और गर्ल फ्रेंड का वो शुद्ध रूप से पश्चिम से आयातित है. इसके अलावा जो ये नए-नए रिलेशनशिप का प्रचलन हुआ है ये बाज़ार की देन है. तुम देख लो कितने प्रकार के रिलेशनशिप आजकल प्रचलन में हैं. लिव इन को ही ले लो लिव इन, ओपन मैरिज और पॉलीगैमी जैसी अवधारणाएं, जो पश्चिमी समाजों में अधिक प्रचलित हैं, धीरे-धीरे भारत के महानगरों में अपनी जगह बना रही हैं । ये रिश्ते पारंपरिक भारतीय विवाह की एकाकी प्रकृति से सीधे तौर पर टकराते हैं, क्योंकि भारतीय समाज में विवाह को एक पवित्र और अटूट बंधन माना जाता है । कैजुअल रिलेशनशिप, सिचुएशनशिप, लॉन्ग-डिस्टेंस रिलेशनशिप, ओपन रिलेशनशिप, डेटिंग रिलेशनशिप, कमिटेड रिलेशनशिप, कैजुअल रिलेशनशिप जैसी मान्यताएं ये सब हमारे समाज और हमारी परम्पराओं से सीधे टकराती हैं. हमारा समाज अनेक जन्मो के सिद्धांत को मानता है और विवाह को सात जन्मों का साथ समझा जाता है. जबकि पश्चिम में एक जन्म का सिद्धांत है इसलिए एक सामान्य विचार वहां काम करता है जिसमे इसी जीवन में सब आनंद प्राप्त कर लेने पर जोर है. इसलिए हमारी परंपरा में कि विवाह पूर्व शारीरिक संबंधो को जगह नहीं दी गयी है क्योंकि अंततोगत्वा ये अवसाद, और दुःख ही देता है. रेखा आश्चर्यचकित सी माँ को देखे जा रही थी इतनी सारी जानकारी आजकल के संबंधों पर उन्हें है फिर भी उन्होंने मेरे ऊपर विश्वास किया. उसकी आँखे फिर आंसुओं से भर गयीं. हम बच्चे भी न अपने माँ-बाप को एकदम बेवकूफ समझते हैं जबकि वो अपने बच्चों की ख़ुशी के लिए कितनी बार न चाहते हुए भी आँखे मूद लेते हैं. माँ के प्यार और विश्वास ने रेखा के भीतर के अवसाद को सोख लिया था, आज उसने जाना कि माँ होना क्या होता है. उसने मोबाइल उठाया और अरूप को आखिरी मैसेज टाइप किया. तुम्हे शायद अहसास नहीं होगा कि इन बारह-तेरह महीनों में मैं कितनी बार टूट कर बिखरी हूँ कि अगर उन बिखरे हिस्सों को समेटना चाहूँ तो भी नहीं समेट सकती. छले जाने का दर्द किसी को किस तरह छील देता है तुम्हे इसका अनुमान भी नहीं होगा. हो सकता है कि तुम्हारे लिए ये सामान्य बात हो पर स्त्री जब किसी को प्रेम करती है तो वो प्रेम उसकी आत्मा से निकलता है और जब उसे धोखा मिलता है तो उसका वजूद, उसकी आत्मा छलनी-छलनी हो जाती है. अब मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए, और तुम मुझे दे भी क्या सकते हो. भावनाओं से रिक्त व्यक्ति एक ऐसे घड़े के सामान है जिसमे छल और धोखे के छेद ही छेद हैं उसमे कुछ भी टिक नहीं सकता. सेंड का बटन दबाते-दबाते उसकी नाभि में कुछ घुमड़ा और आंसुओं की शक्ल में बह निकला. लेकिन थोड़ी देर में ही उसने खुद पर नियंत्रण किया और उसी घाट के किनारे के लिए निकल गयी जहाँ उसका प्रेम परवान चढ़ा था. आज वहीँ वो उन सब यादों, अहसासों को उसी नदी में बहा देगी जो हमेशा उसके अधूरे प्रेम की साक्षी रही है.रेखा शांत किनारे पर बैठी रही और नदी बहती रही.