कोमल के मोबाइल की घंटी बजी तो उसने किताब से नजरें हटा कर मोबाइल की ओर डाली. फेसबुक कॉल थी किसी अरुण की. कौन अरुण ? उसने दिमाग के भीतर जा कर इस नाम का फोल्डर सर्च किया लेकिन तब तक रिफ्लेक्स में फोन उठ गया. उधर से आवाज आई, ‘कोमल पहचाना मुझे ? मैं अरुण. अरुण नाम की एक बड़ी पुरानी फाइल खुली दिमाग में. अरे! ये तो हाई स्कूल में पढता था मेरे साथ. आज इतने सालों बाद मेरा नंबर कैसे मिला इसे? ये तो फेसबुक कॉल थी पर उस क्षण ये बात उसे याद ही नहीं रही. कोमल, स्मृतियों के जंगल में घुसती चली गयी. माँ के जाने के बाद अरुण ही तो था जिसने उसकी मन की गांठों को खोलने की और उस दुनिया में झाँकने का प्रयास किया था जहाँ निराशा का अंधकार कुंडली मारे बैठा था. चार साल की थी जब माँ का आंचल छूट गया. हल्की सी, धुंधली सी याद बची है. बाहर बरामदे में माँ को लिटाया गया था. उसका भाई विकास, जो उससे सिर्फ तीन साल बड़ा था रोये जा रहा था. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि माँ ऐसे क्यों सोई है और लोग रो क्यों रहे हैं. लोगों को रोता देख कर मैं माँ से चिपट गयी और चिल्ला-चिल्ला कर रोने लगी. फिर शायद बुआ या कोई और मुझे माँ के पास से हटा ले गया. दूर से ही मैंने देखा कि माँ को बांस की सीढ़ी पर लिटा दिया गया और उसके ऊपर रंगीन कपडा डाला गया, खूब फूल-माला डाली गयी और पापा चाचा लोगों ने माँ के उस बिस्तरे को उठा कर कंधे पर ले लिया और कहीं चले गए. शाम को वो लोग लौटे तो विकास के सिर के बाल नहीं थे और वो सफ़ेद से कपड़े में लिपटा था. तब तो नहीं समझी थी पर आज जानती हूँ कि भाई उस दिन अपना बचपन भी माँ की चिता पर चढ़ा आया था. कुछ दिन बाद खूब खाना-पीना हुआ और लोग जो आ गए थे जाने लगे. सबके जाने के बाद घर एक अंतहीन चुप्पी का स्मारक हो गया. भाई हर समय चुप-चाप कहीं अंतरिक्ष में घूरता रहता जैसे माँ को उस अंतहीन आकाश में ढूंढने की कोशिश कर रहा हो. पापा हमारे साथ खेलते हमसे बातें करते और फिर अचानक उनकी आँखों से कुछ बूंदें टपक कर हमारी छोटी-छोटी हथेलियों में समा जातीं. साल बीतते-बीतते एक आंटी हमारे घर आने लगीं. माधुरी नाम था उनका. उनके आने पर पापा बहुत खुश हो जाते. सूखे वृक्ष पर जैसे ताजे फूल लग गए हों. एक दिन माधुरी आंटी दुल्हन के कपड़ों में पापा के साथ आ गयीं हमारी नयी माँ बन कर. कुछ दिन उन्होंने हमें भरपूर प्रेम दिया. ऐसा लगा कि हमारे जीवन की सूखी बगिया में बहार आ गयी. हमारे मन की शुष्क डालियों पर नए कोंपलों की आहट सुनाई देने लगी. पर ये बहार चिरस्थाई नहीं थी. माँ ने एक साल में एक बच्चे को जन्म दिया. बच्चे के आते ही माँ-पापा का ध्यान हमसे हट गया. उपेक्षा का दंश हमारे वजूद को दीमक की तरह चाटने लगा. अब धीरे-धीरे बर्तन झाड़ू का काम माँ मुझसे करवाने लगी. भाई से देखा नहीं जाता तो वो भी मेरा हाथ बटा देता. उस समय परिवारों में इतना जुड़ाव था तब दूसरी शादी के कारण हम बच्चों का ये हाल हो गया था. आज की दुनिया में तो ऐसे-ऐसे सम्बन्ध हैं जिसमे पति-पत्नी होना भी आवश्यक नहीं रह गया है. लिव-इन, सीरियस, लॉन्ग डिस्टेंस न मालूम कैसे-कैसे सम्बन्ध बनाये जा रहे हैं. इन संबंधों में अगर बच्चे हो गए तो उनका क्या होगा? कौन उन्हें अपनाएगा? शायद इसी चक्कर में सिंगल मदर का प्रचलन बढ़ रहा है. स्त्री पुरुष से इतर एक स्वतंत्र अस्तित्व की तलाश कर रही है, पर क्या ये समाज और परिवार के टूटने की शुरुआत नहीं. उस स्वतंत्रता का क्या मोल जिसमे प्रेम का सर्वथा अभाव हो, जिसमे बच्चों के नन्हे हाथों का कोमल स्पर्श न हो, उनकी किलकारियां न गूंजती हो. तभी पड़ोस में अरुण के मम्मी-पापा रहने के लिए आये. अरुण भी नवीं में था और मेरे स्कूल में ही था. पर लड़कियों और लड़कों के स्कूल अलग थे. सीधा-सदा, सींक जैसा दुबला, गहरी आँखें जैसे कोई घाटी हो. पर खिलंदड़ा एक नंबर का. मैं स्कूल जाने के पहले खाना बनाती रहती और वो मोहल्ले के बच्चों के साथ गिल्ली-डंडा खेलता रहता जब तक कि आंटी चीख कर उसे न पुकारतीं. इसके बाद वो सीधे जाकर नल के नीचे बैठ जाता और आंधी तूफान की तरह आधा गीला ही ड्रेस डाल कर खाना जल्दी-जल्दी निगलता और साइकिल उठा कर भाग खड़ा होता. मैं अपनी साइकिल से उसका पीछा करके उसके कालर ठीक करती और एक धौल जमा देती - चल अब जा. वो अजीब सी नज़रों से मुझे देखता और फिर ये जा वो जा. पर हमारे झगडे भी होते थे और जब होते थे तो स्थिति मार-कुटाई तक पहुँच जाती थी. अधिकतर वो कोई गंभीर बात नहीं होती थी बल्कि छोटी-छोटी बात जैसे कि जो कॉमिक्स हम किराये पर मंगाते थे वो पहले कौन पढ़ेगा? इक बार ऐसे ही हम गुत्थम-गुत्था हुए थे कि उसका हाथ मेरे कोमल अंग से जोर से टकराया और मेरी घुटी हुई चीख निकल गयी. वो सहम के छिटक गया. मैंने उसकी आँखों में पश्चात्ताप की छाया तैरते हुए देखी तो उस पर प्यार उमड़ आया. उसके बाद वो कभी वैसे नहीं लड़ा मुझसे जबकि मेरे भीतर कहीं कोई इच्छा जगती कि वो पहले जैसे गुत्थम गुत्था हो. पर उस एक क्षण में वो बड़ा हो गया था. कभी-कभी जब मैं जिंदगी से निराश बरामदे में बैठ कर सोच में डूबी रहती तो वो चुप-चाप मेरे बगल में आ बैठता था. बिना बोले भी वो घंटों मेरे पास बैठा रहता जैसे मेरी पीड़ा को अपनी उपस्थिति से पीने की कोशिश कर रहा हो. कभी-कभी मेरे हाथ पर बहुत आहिस्ता से अपना हाथ रख देता, उसका कोमल स्पर्श मेरी पीड़ा को बह निकलने के लिए राह बना देता और वो आँखों के रास्ते बह निकलती. उसकी चुप्पी में उसकी सांसो की आवाज मेरी धड़कन के साथ घुल जाती फिर ये जानना मुश्किल हो जाता कि मेरा दिल धड़क रहा है या उसकी सांसें हैं. आज सोचती हूँ कि क्या वो प्रेम था क्या प्रेम ऐसा ही होता है? उन दिनों के लिहाज से हम लोग प्रेम जैसी चीज के लिए बहुत छोटे थे. आज जैसे हालत न थे कि सातवीं में पढने वाली लड़की प्रेम के एस.एम.एस भेजने लगती है. पर आज सोचती हूँ कि वो था कुछ अलग जहाँ चुप्पी की चीख सीधे कहीं भीतर पैबस्त हो रही थी, जहाँ उसका मौन घावों पर मरहम की तरह फ़ैल जाता. आंटी यानी उसकी मम्मी मेरे ऊपर खूब प्यार लुटातीं, कुछ भी स्पेशल बनता तो उसमे मेरा हिस्सा होता ही था. मैं उसके घर का एक हिस्सा बनती जा रही थी. पर अचानक आंटी ने बताया कि अरुण के पापा का ट्रान्सफर हो गया है और वो लोग अब एक महीने में चले जायेंगे. मेरे भीतर छन्न से टूट कर कुछ बिखर गया था. वो डाली जिस पर मेरा वज़ूद बेल की तरह लिपटा था अचानक टूट गयी जैसे. परीक्षाएं समाप्त हो गयीं थीं और गर्मियों की छुट्टियाँ हो चुकी थीं. पहले तो ये तय हुआ था कि गर्मियों में खूब कॉमिक्स पढेंगे. तब कोई मोबाइल नहीं थे और न टी.वी तो मोटू-पतलू, लम्बू-छोटू, नागराज, चाचा चौधरी, कमांडो ध्रुव और चम्पक और चंदामामा ही हमारे मनोरंजन के साधन थे. पर अब जबसे ये पता चला कि अरुण चला जायेगा तो इन किताबों में रस ही नहीं आता. लम्बी दुपहरी का सन्नाटा हमारे बीच पसरा रहता और हम घंटों मौन में बैठे रहते भीतर के शोर से लड़ते हुए. फिर वो दिन भी आ गया था जब एक बड़े से ट्रक में उनका सामान लादा जाने लगा. ट्रक के जाने के बाद उसी रात वो लोग ट्रेन से रवाना होने वाले थे. उस दिन मैं आंटी को पकड़ कर इतना रोई थी कि उनका आँचल मेरे आंसुओं से तर हो गया. मेरी माँ गयी थी तो इतनी छोटी थी कि बिछुड़ने का मतलब ही नहीं पता था और आज जैसे मेरा माँ से दूसरी बार नाता टूट रहा था. उनके जाने के बाद मैं पूरी तरह बिखर गयी थी. अपने को सहेजने, समेटने में बहुत वक्त लगा. एकाध पत्र मैंने अरुण को डाले थे जिसका जबाब भेजने को मैंने ही मना कर दिया था. इक्कीस की होते-होते पापा ने मेरी शादी कर दी. और आजकल मैं अपने पति के साथ इंदौर में थी और आज अचानक से ये फ़ोन. सो गयी क्या कोमल या बात नहीं करना चाहती? उधर से अरुण की आवाज की आवाज आयी. मैं अचानक से अतीत के कोटरों से निकल कर बाहर आ गयी. हाँ अरुण, पहचाना. कहाँ हो आजकल, क्या कर रहे हो? शादी-वादी की या नहीं? मैं जैसे एक सांस में सब कुछ पूछ लेना चाहती थी. अरुण हंसा – तुम बदली नहीं, एक सांस में इतने सवाल? मैं किसका जबाब दूँ पहले? सुन मैं इंदौर में ही हूँ और तेरे अकाउंट से मुझे पता चल गया है कि तुम भी इंदौर में ही हो. अपना पता दे मैं आता हूँ शाम को मिलने तब सारी बातें करेंगे. मैंने उसे अपना पता बताया. उसने शाम को आने का बोल कर फोन काट दिया. मैं एक बार फिर से पंद्रह साल की हो गयी थी. कैसा दिखता होगा? आवाज भी तो कितनी भारी हो गयी है लगता ही नहीं है कि उसी से बात करके हटी हूँ अभी. पति और बच्चों से उसका परिचय कैसे कराउंगी? यही सब सोचते-सोचते घर ठीक करने लगी तभी कॉल बेल बजी. बच्चे स्कूल से आ गए थे. मैं अपने कल्पना लोक से वर्तमान में लौट आई.