घर अब सूना हो गया था. एक भयावह सन्नाटा घर के कोने-कोने तक समा गया था ऐसे जैसे बहुत शोर वाली फिल्म अचानक रुक गयी हो और सारा हॉल एक सन्नाटे में डूब जाये. राजेश की तेरहवीं बीत गयी और रिश्तेदार एक-एक कर विदा हो गए. घर के काम निपटा कर निशा खिड़की के पास कुर्सी पर ढेर हो गयी है. आसमान में काले बादल छाये हुए हैं. दूर कहीं बिजली चमकी और उसके जिस्म का पत्ता-पत्ता सिहर उठा. बिजली की चमक में वो अपने भविष्य को खोजने की नाकाम कोशिश करती है. अब? ये अब? अब उसके पूरे वजूद पर सवालों की बेल बन कर लिपट गया है. राजेश थे तो सारे निर्णय वही लेते थे. उसका जीवन किसी मशीन के पुर्जे से अधिक नहीं था जिसकी अपनी कोई अलग सत्ता नहीं होती वो बस अपने रोल तक सीमित रहता है. शादी के पहले के देखे हुए सपने जाने कब के मुट्ठी में बंद रेत की तरह मिट्टी में गर्क हो गए थे. अपने सारे अहसास, कल्पनाएँ, इच्छाएं एक पोटली में बाँध कर वह घर के किसी अँधेरे कोने में टांग आई थी जहाँ किसी की निगाह न पहुंचे. प्रेम पर बड़े काव्य पढ़े थे उसने शादी के पहले. प्रेम कहानियां पढ़ती तो कल्पनाओं के सागर में हफ़्तों तैरती रहती, यथार्थ का किनारा देखती भी तो फिर मछली की तरह वापस सागर की लहरों में गुम हो जाती. देर रात तक किताबें पढना और फिर उन्हें अपने कोमल वक्ष पर रख कर सपनों की दुनियां में खो जाना उसका सबसे प्रिय शगल था. राजेश की पत्नी बन के आई तो उसने सोचा कि उसके सारे सपने फूलों की बगिया बन कर उसको अपनी सुगंध में सराबोर कर देंगे. पर ये बगिया दो दिन में ही सूख गयी. प्रेम जैसा राजेश में कुछ भी नहीं था और उस बगिया को सींचने के लिए प्रेम की बारिश चाहिए थी. लेकिन राजेश तो पितृसत्ता के शिखर पर किसी अधिनायक की तरह आसीन थे. कोमल भावनाओं से सर्वथा दूर. धीरे-धीरे वो तीन बच्चों की माँ बनी पर पर उसकी देह ने प्रेम की कोमल छुअन को कभी महसूस नहीं किया. वो छुअन जो उसकी पोर-पोर को जिन्दा होने के अहसास से भर दे, जो उसको पक्षी की तरह उन्मुक्त आकाश में उड़ा ले जाये, जो उसको पतंग की तरह आकाश में नृत्य करने पर मजबूर कर दे. उसके अधर उन सूखी पंखुड़ियों की तरह हो गए थे जिन पर प्रेम के हस्ताक्षर कभी नहीं किये गए. राजेश के रूखे व्यवहार के ताप से उसके भीतर बहती प्रेम की नदी सूखती चली गयी. बच्चे भी इस अधिनायकवाद की भेंट चढ़ कर रास्ता भटक गए. उसके जीवन में आशा की जो बारीक सी किरण थी वो भी गुम हो गयी. धीरे-धीरे उसने अपने जीवन को दुखों की इस नदी की लहरों के सहारे छोड़ दिया कि अब जो हो सो हो. राजेश बीमार पड़े तो बेटी ने हाथ बढाया और इलाज का सारा जिम्मा संभाल लिया. बेटियां जिन्हें हम अक्सर कमजोर समझ कर बहुत मूल्य नहीं देते मजबूत शाख की तरह आपका सहारा बन जाती हैं. पर बेटी-दामाद की मेहनत से भी कोई परिणाम हाथ नहीं आया और राजेश का अधिनायक यम को कोई आदेश नहीं दे सका और उसे उनके सामने समर्पण करना ही पड़ा. राजेश के निधन के बाद सब कुछ यंत्रवत होता चला गया. दाह-संस्कार, दसवां, खोरसी, तेरही सब होते गए. इस गहमा-गहमी में तेरह दिन कब बीत गए पता ही नहीं चला. उसके आंसू तो वर्षों पहले सूख गए थे लेकिन किसी का जाना आपके जीवन में एक रिक्तता तो भर ही देता है. ये निर्वात कभी-कभी उसकी सूखी आँखों के कुँए से कुछ बूंदें खींच ला रहा था. उसका जीवन एक ऐसे पक्षी की तरह गुजरा था जिसकी डोर हमेशा राजेश के हाथों में थी. एक ऐसा पक्षी जिसके पंख तो हों पर एकदम बेजान-बेदम. अब ये डोर तो कट गयी पर उसके पंख तो बेजान थे वो धड़ाम से जमीन पर आ गिरी. अचानक वर्षा की बूंदों ने खिड़की के रास्ते आकर उसके माथे को चूमना शुरू किया तो उसकी तन्द्रा टूटी. बाहर बादल टूट कर बरस रहे थे. निशा को लगा कि उसका सारा अस्तित्व इस बारिश में घुल कर बह रहा हो. उसने फिर आंखे बन्द कर लीं.